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योग-ध्यान: ब्रह्मांड में जो कुछ भी है, वह इस शरीर में है

शरीर में लगभग 34 हजार नाडि़यां हैं। ये समस्त नाड़ियां शरीर को जाल की तरह जकड़े हुए हैं। परमात्मा और स्वर्ग मुक्ति  यदि कहीं आकाश में है, तो वह आकाश हमारे शरीर में है। ब्रह्मांड में जो कुछ भी है, वह इस शरीर में है। मूल और सर्वाधिक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक जानकारी, भारतीय तत्व दर्शियों ने दी थी। उसका विज्ञान और आत्म-साक्षात्कार की वैज्ञानिक साधनाएं भी। वे कठिन भले ही हों, लेकिन भारतीय अध्यात्म और आस्तिकता कह परख का उससे बढ़िया न तो उपाय है और न कोई दूसरा विज्ञान

देखने में शरीर की बाह्य त्वचा और आंख, कान, नाक, मुंह, हाथ, पैर आदि थोड़े अंग ही दिखाई देते हैं, पर इसके भीतर ज्ञान-विज्ञान, शक्ति और पदार्थ का भाण्डागार छिपा पड़ा है। पदार्थ स्थूल होने से उसकी जानकारी अधिक मिल गई, पर शक्ति सूक्ष्म होने से विज्ञान अभी तक उसके प्रवेश द्वार पर ही है। भौतिक शक्तियों का बाह्य विश्लेषण वैज्ञानिकों ने बहुत अधिक किया है, पर उसका आध्यात्मिक शक्तियों से संयोग न होने के कारण, उन्होंने मनुष्य शरीर  चेतना की समस्याओं को सुलझाने की बजाय और उलझा दिया।

मनुष्य शरीर का सूक्ष्म और शक्ति भाग नाडि़यों से प्रारंभ हाता है। शरीर विज्ञान भी मानता है कि शरीर में नाडि़यों का इतना लम्बा जाल बिछा हुआ है कि सबको लम्बा खींचकर जोड़ दिया जाए, तो विषुवत रेखा पर गांठ लगाई जा सकती है। शिव संहिता के अनुसार, शरीर में 34 हजार नाड़ियां हैं। ये समस्त नाड़ियां शरीर को जाल की तरह जकड़े हुए हैं। इन नाडि़यों के महत्व को समझना और उनके द्वारा अतींद्रिय शक्तियों का उद्घाटन करना संभव नहीं। अन्ततः योग-साधनाएं ही आधार रह जाती हैं।

Courtesy:amarujala

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StevSearma

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StevSearma

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