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मां बच्चों को अपना दूध जरूर पिलाएं, और ऐसा न करने का नुकसान|

मां बच्चों को अपना दूध जरूर पिलाएं। अगर वे ऐसा नहीं करती हैं तो नुकसान बच्चों को ही झेलना होगा, जो शायद किसी भी मां को बर्दाश्त नहीं होगा। पढ़ें एक्सपर्ट्स की राय।

देश में 58.4 फीसदी बच्चों को जन्म लेते ही मां का दूध नहीं पिलाया जाता। इस कारण नवजात की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। समय के साथ इनका वजन कम होना, उम्र के हिसाब से वृद्धि न होना, नजरें कमजोर होना, सुस्त रहना और मोटापा जैसी कई समस्याएं उनको घेर लेती हैं। पीजीआईएमएस में कम्यूनिटी मेडिसन विभाग की यूनिट दो की प्रोफेसर डॉ. मीनाक्षी कलहन के अनुसार नेशनल फैमिली हेल्थ सर्विस ने 2015-16 में एक सर्वे कराया।

सर्वे में पांच साल तक के बच्चों के स्वास्थ्य का आंकलन किया गया है। रिपोर्ट से सामने आया कि नवजात के जन्म लेने के बाद आधे से ज्यादा मामलों में मां अपना दूध नहीं पिला पाती हैं। कुछ जगहों पर इस दौरान घुट्टी पिला दी जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार यह ठीक नहीं है। इससे नवजात को संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाता है। वहीं नवजात को जब जन्म लेने के काफी देर तक मां का दूध नहीं पिलाया जाता तो उसका ब्लड शुगर लेवल का स्तर गिरने लगता है।

विशेषज्ञों की मानें तो पहले छह माह पानी भी नहीं पिलाना चाहिए। देश में जागरूकता अभियान चलाने के बाद भी अब पहले छह माह में माताओं द्वारा अपने बच्चों को दूध पिलाने का आंकड़ा 54 प्रतिशत ही पहुंच पाया है। छह माह बाद बच्चे को मां के दूध के साथ तरल आहार 35 से 40 प्रतिशत देना होता है। मां अपने बच्चे को जब तक चाहे दूध पिला सकती है। यह बात और है कि उम्र बढ़ने के साथ दूसरे पदार्थ भी दिए जाते हैं। ऐसा न करने से बच्चों की लंबाई कम रह जाती है।

डॉ. मीनाक्षी ने बताया कि जो बच्चे मां का दूध पीते हैं वह स्वस्थ होते हैं, जबकि गाय और भैंस का दूध पीने वाले मोटे और सुस्त होते हैं। गाय और भैंस के दूध में प्रोटीन अधिक होता है। बच्चे के लिए यह ठीक नहीं होता है। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि समय पर मां के बच्चों को दूध पिलाने से दुनिया में हर साल बच्चों की आठ लाख मौतों को रोका जाता है। नार्मल डिलीवरी के साथ सिजेरियन डिलीवरी वाली दोनों महिलाओं को अपने बच्चे को समय पर दूध पिलाना चाहिए।

क्रेच सुविधाओं की बहुत कमी
आधुनिकता की दौड़ में महिलाएं भी पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल रही हैं। नौकरीपेश महिलाओं में स्तनपान का प्रतिशत काफी कम है। कामकाजी महिलाओं के अनुसार महानगरों में क्रेच की सुविधाएं होती हैं। यहां वर्किंग वुमेन जाकर अपने बच्चों को दूध पिला लेती हैं, लेकिन छोटे नगरों में इसका अभाव होता है।

ऐसे देखें बच्चे का स्वास्थ्य
– पहले पांच माह में बच्चे का वजन डबल होता है।
– एक साल में बच्चे का वजन तीन गुणा बढ़ता है।
– दो साल में बच्चे का चार गुणा अधिक वजन हो जाता है।

 

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